बस्तर में मुठभेड़ विवाद पर माओवादियों का 3 पन्नों का बयान
जगदलपुर। दंडकारण्य स्पेशल ज़ोनल कमेटी (डीकेएसज़ेडसी) ने 27 नवंबर 2025 को तीन पन्नों का विस्तृत प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए नक्सलगढ़ के चर्चित कमांडर हिड़मा की मौत और हालिया पुलिस अभियानों पर अपनी विस्तृत स्थिति सार्वजनिक की है। यह बयान बस्तर और देशभर के राजनीतिक–सुरक्षा हलकों में एक नई बहस का केंद्र बन गया है। माओवादी दस्तावेज़ में केवल हिड़मा की मौत को लेकर उठे सवालों का ज़िक्र नहीं है बल्कि पिछले दो वर्षों में बस्तर, बीजापुर, सुकमा, अबूझमाड़ और पड़ोसी राज्यों के आदिवासी इलाकों में हुई घटनाओं, पुलिस अभियानों, जनसंगठनों की भूमिका, राजनीतिक दखल और मीडिया के रवैये पर भी धारदार आरोप लगाए गए हैं।
वक्तव्य की शुरुआत में माओवादियों ने दावा किया कि हिड़मा की हत्या को “मुठभेड़” बताकर सरकार असलियत छिपाने की कोशिश कर रही है। बयान में कहा गया कि हिड़मा की मौत साधारण एनकाउंटर नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलाए गए एक योजनाबद्ध अभियान का परिणाम थी। कमेटी ने इसे “नकली मुठभेड़” कहने वाले कुछ जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल अफवाहों पर आधारित नहीं था बल्कि स्थानीय स्रोतों की विश्वसनीय जानकारी से जुड़े थे, जिन्हें दबाने और बदनाम करने के लिए राज्य की मशीनरी सक्रिय हुई। वक्तव्य का बड़ा हिस्सा यह बताने में लगाया गया है कि किस तरह सरकार और मीडिया ने घटना का आधिकारिक संस्करण बनाकर जनमानस के सामने पेश किया, जबकि माओवादियों का दावा है कि यह सच्चाई से बिल्कुल अलग था।
वक्तव्य के दूसरे हिस्से में कमेटी ने हिड़मा के संगठनात्मक सफर पर प्रकाश डाला है। बयान के अनुसार, हिड़मा ने कम उम्र में पार्टी की ज़िम्मेदारी संभाली और कई वर्षों तक अबूझमाड़–दंडकारण्य क्षेत्र में जनसंगठन, गुरिल्ला दस्ता और राजनीतिक शिक्षा के काम में सक्रिय रहे। संगठन ने उसे “जनयुद्ध का प्रशिक्षित कमांडर” बताते हुए कहा कि उसके बारे में फैलाई जा रही निजी विवादों और अंदरूनी मतभेदों की कहानियाँ राज्य द्वारा रची गई साज़िशें हैं, जिनका उद्देश्य संगठन के भीतर अविश्वास फैलाना है। बयान में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि कुछ आदिवासी नेताओं और पूर्व कार्यकर्ताओं द्वारा हिड़मा की मौत के लिए संगठन के वरिष्ठ नेता देवजी को दोषी ठहराना पूरी तरह झूठा है और इसका एकमात्र मकसद आंदोलन को विभाजित करना है।
दस्तावेज़ में दंडकारण्य और आसपास के राज्यों में साल 2024–25 के दौरान हुई कई विवादित घटनाओं का उदाहरण देते हुए सुरक्षा बलों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। बयान के अनुसार लगातार कई अभियानों में ग्रामीणों को माओवादी बताकर मार दिया गया, महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाएं हुईं, और गांवों को खाली कराने के लिए सुरक्षा अभियानों का उपयोग किया गया। बयान में बार-बार कहा गया कि इन अभियानों का लक्ष्य केवल माओवादी कैडर नहीं बल्कि जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को विस्थापित कर कॉरपोरेट कंपनियों को भूमि और संसाधन उपलब्ध कराना है। इस संदर्भ में बयान में बस्तर के कई क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया कि इन्हें लागू करने के लिए सेना जैसी तैनाती के साथ “जनयुद्ध की आड़ में कॉरपोरेट ऑपरेशन” चलाया जा रहा है।
प्रेस विज्ञप्ति में केंद्र और राज्य सरकारों पर तीखी राजनीतिक टिप्पणी भी दर्ज है। कमेटी ने आरोप लगाया कि वर्तमान शासन जनता के नाम पर कॉरपोरेटों को लाभ पहुंचाने वाली नीतियाँ लागू कर रहा है और आदिवासी इलाकों में सैन्य दमन को विकास बताया जा रहा है। प्रेस नोट में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा गया कि दोनों दलों ने बस्तर को आर्थिक-सैनिक प्रयोगशाला में बदल दिया है और विपक्ष भी जनता के मुद्दों पर खामोश है। बयान में यह भी कहा गया कि राज्य और केंद्र सरकारें “कॉरपोरेट हिन्दुत्ववाद” की राजनीतिक संरचना तैयार कर रही हैं, जिसके लिए माओवादी आंदोलन को खलनायक बनाकर जनता की सहानुभूति काटने का काम किया जा रहा है।
तीसरे पन्ने में माओवादियों ने जनता से एकजुट होने की अपील की है। वक्तव्य में लिखा है कि हिड़मा की मौत से संघर्ष समाप्त नहीं होने वाला बल्कि और तीव्र होगा। कमेटी ने कहा कि आदिवासी समाज और लोकतांत्रिक संगठनों को एकजुट होकर न्यायिक जांच की मांग करनी चाहिए और सरकारी दावों पर आँख बंद कर भरोसा नहीं करना चाहिए। बयान का अंत “जनता से अपील” और आंदोलन की नई रणनीति के संकेतों के साथ होता है।
यह पूरी घटना सिर्फ एक मुठभेड़ का मामला नहीं बल्कि बस्तर की जमीन, संसाधन, सुरक्षा नीति, आदिवासी अधिकार और राजनीतिक संघर्ष की परतों को उजागर करती है। यह बयान एक प्रतिबंधित संगठन का दृष्टिकोण है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि वर्तमान में संभव नहीं है, लेकिन यह बस्तर की चल रही जमीनी हकीकत का महत्वपूर्ण पहलू उजागर करता है।