जगदलपुर। एक ओर केंद्र सरकार “एक पेड़ माँ के नाम” जैसी योजनाओं के जरिये हरियाली बचाने की मुहिम चला रहा है, वहीं दूसरी ओर शहर के बीचोंबीच स्थित शहीद पार्क में दर्जनों हरे-भरे पेड़ों की कटाई ने निगम की कार्यशैली और नीयत दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। निगम की इस कार्रवाई से शहर के नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों में गहरा आक्रोश है।
जानकारी के अनुसार, नगर निगम ने शहीद पार्क में “उन्नयन और सौंदर्यीकरण” के नाम पर कई वर्षों पुराने अशोक और अन्य प्रजातियों के सीधे, स्वस्थ पेड़ काट दिए हैं। जबकि निगम अधिकारियों का दावा है कि केवल “छटाई” की गई है और सिर्फ झुके या क्षतिग्रस्त पेड़ों को ही हटाया गया है।
हालाँकि, स्थानीय लोगों और पार्क में आने वाले नागरिकों का कहना है कि जिन पेड़ों को काटा गया, वे पूरी तरह स्वस्थ और सीधे थे, वे न केवल छाया प्रदान करते थे बल्कि सुबह-शाम व्यायाम और विश्राम करने वालों के लिए शरणस्थल जैसे थे।
शहर के प्रबुद्धजनों ने भी चिंता जताई है कि “शहीद पार्क शहर का एकमात्र हरित फेफड़ा था, जहाँ नागरिकों को प्रकृति के बीच सुकून मिलता था। यदि यही रफ्तार जारी रही तो यह भी दलपत सागर की तरह अपनी पहचान खो देगा।”
पूर्व महापौर जतिन जायसवाल ने निगम की इस कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा, “ऐसे हरे-भरे पेड़ों को काटना सीधे तौर पर प्रदूषण को बढ़ावा देने जैसा अपराध है। जब पूरा देश हरियाली बचाने की दिशा में काम कर रहा है, तब निगम का यह रवैया बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और जनभावनाओं के विपरीत है।”
वहीं शहर के वरिष्ठ नागरिक और नियमित रूप से पार्क में आने वाले पत्रकार महेंद्र महापात्र ने कहा, “एक पेड़ को परिपक्व होने में 30 से 40 वर्ष लगते हैं। शहीद पार्क में जो पेड़ काटे गए, वे किसी के लिए खतरा नहीं थे। बल्कि वे धूप से राहत और वातावरण में ठंडक बनाए रखते थे। अब जब वे नहीं हैं, तो यहाँ आने वाले लगभग सभी लोग निराश और नाराज़ हैं।”
इस संबंध में कार्यपालन अभियंता गोपाल भारद्वाज ने कहा कि “पार्क का उन्नयन किया जा रहा है। प्रस्ताव भेजा गया है और पेड़ों की केवल छटाई की गई है। जो पेड़ झुके हुए थे या खतरा उत्पन्न कर रहे थे, केवल उन्हीं को काटा गया है।”
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि नगर निगम इस मामले की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करे और शहीद पार्क की शेष हरियाली को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए।
जनता का अब सीधा सवाल है — “क्या शहर में विकास का मतलब हरियाली की बलि लेना है?” यदि प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो शहीद पार्क सिर्फ यादों में रह जाएगा, जहाँ कभी लोग सुकून की साँस लेने जाया करते थे।