अपनी बात सीधी साफ
महेश गोयन
रायपुर। (RTI) सूचना का अधिकार एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे आप सरकारी संस्थानों से उनके लेखा जोखा का हिसाब किताब ले सकते हैं जिसे सरकारी काम काज मे पारदर्शिता बनी रहे और हो रहे भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के उद्देश्य से 2005 मे लागू किया गया था। सूचना के अधिकार से प्रशासनिक अधिकारियों कर्मचारियों द्वारा सरकारी खजाने से किए गए लेन देन का हिसाब करने के लिए कोई भी सामान्य साधारण व्यक्ति आवेदन कर सकता है जिसको इसकी जानकारी है। और आसानी से इस आवेदन के माध्यम से सरकारी खजाने मे हो रहे लेन देन का जानकारी प्राप्त कर सकता है। यदि किसी के द्वारा सरकारी पैसों का दुरुपयोग किया जा रहा है तो उसका भी ब्यौरा प्राप्त कर सकता है। लेकिन कहते हैं न हर मर्ज कि दवा होती है ठीक उसी तरह जहां एक ओर नियम बनाए जाते हैं तो दूसरी ओर नियम बनाने से पहले ही नियम तोड़ने उल्लंघन करने का रास्ता ढूंढ लेते हैं जैसे कि इस मामले है जहां जन सूचना के अधिकार का तोड़ निकाल लिया गया है आवेदक को उसके आवेदन का जवाब ही न देना या फिर आधा अधूरा ही जानकारी थमा देना। क्योंकि सभी विभाग के अधिकारी को पता होता है कि विभाग के छोटे से लेकर बड़े अधिकारी सबका हिस्सा शामिल है इस सरकारी खजाने को लूटने मे तो कार्यवाही करेगा कौन आवेदक जन सूचना अधिकारी से लेकर अपीलीय अधिकारी और अपीलीय अधिकारी से राज्य सूचना आयोग तक ही दौड़ लगा सकता है गिने चुने लोग ही केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंच पाते हैं तो रही राज्य की बात तो सब सेट है जन सूचना से लेकर राज्य सूचना आयोग तक क्योंकि राज्य सूचना आयोग तो पिछले कई वर्षों से खाली ही है आखिर इतने वर्षों से इस स्थान और पद की पूर्ति क्यूं नही की जा रही है सरकार क्या चाहती है क्या मानसा है सरकार की ये तो सरकार मे बैठे लोग ही बता सकते हैं चूंकि राज्य सूचना आयोग के खाली होने से पूरे छत्तीसगढ़ की बात करें तो हजारों मामले लंबित पड़े हैं। जिसका फायदा उठा रहे हैं ये जन सूचना अधिकारी और अपीलीय अधिकारी क्योंकि इनको भी पता है सुनेगा कौन इसलिए तो आवेदक को चाही गई जानकारी ये अधिकारी देते ही नही जिससे इन अधिकारियों के द्वारा किए गए भ्रष्टाचार सामने ही नही आ पाते यहां तक कि आवेदक को कुछ अधिकारी तो यह भी कहते हैं जाओ जहां जाना है जाओ हमारा कुछ उखाड़ नही सकते आजतक किसी को कोई सजा हुई है क्या जो हमको मिलेगी सजा। हां यदि अधिकारियों के द्वारा दिए गए प्रलोभन को आवेदक स्वीकार कर लेता है तो सब ठीक है फिर सारे शिकवे शिकायत दूर दोनों की ओर से लेकिन इन सब के बीच एक सवाल तो आवश्य बनता है कि राज्य सूचना आयोग की पूर्ति क्यूं नही की जा रही है। सरकार को इस ओर आवश्य ध्यान देना चाहिए ताकि जिस उद्देश्य से सूचना का अधिकार लागू किया गया था उस उद्देश्य कि पूर्ति हो सके और भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके।