रायपुर : कभी जिन रास्तों पर कदम रखने से पहले लोग कई बार सोचते थे, जहां जंगलों के बीच बंदूक की आवाज और बारूदी सुरंगों का डर बस्तर की पहचान बन गया था, उन्हीं इलाकों में अब बदलाव की एक नई कहानी लिखी जा रही है। यह बदलाव केवल सड़कों, सुरक्षा कैंपों या विकास कार्यों में नहीं, बल्कि उन लोगों की जिंदगी में भी दिखाई दे रहा है, जिन्होंने हिंसा का दौर अपनी आंखों से देखा है।
दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर भ्रमण के दूसरे दिन
सुकमा से जगरगुंडा और केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक का सफर किया। करीब 13
घंटे से अधिक चले इस सफर में उन्होंने बस्तर के उस चेहरे को करीब से
देखा, जो लंबे समय तक देश के सामने नक्सल हिंसा की खबरों के
जरिए ही आया। पुनर्वास केंद्र में मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से संवाद से
लेकर सुरक्षा व्यवस्था को समझने, ‘खूनी सड़क’ से गुजरने, 76 जवानों की शहादत से जुड़े क्षेत्र को
देखने, ग्रामीणों से बातचीत करने, 21 साल
तक बंद रहे श्रीराम मंदिर में पहुंचने और अंत में पूवर्ती में हिडमा के परिवार से
मिलने तक की यह यात्रा बस्तर के अतीत, वर्तमान और बदलती
परिस्थितियों की एक जीवंत तस्वीर बन गई।
सुबह सुकमा पहुंचने के बाद
इंफ्लुएंसर्स ने सबसे पहले सुकमा पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने
आत्मसमर्पण कर हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से सीधे
संवाद किया। बातचीत में उन्होंने उनके जीवन, आत्मसमर्पण
के बाद आए बदलाव और सामान्य जीवन की ओर लौटने के अनुभवों को समझा।
इन चेहरों के पीछे एक लंबा और कठिन
अतीत था, लेकिन उनके सामने खड़े
होकर संवाद करते इंफ्लुएंसर्स को बस्तर की कहानी का एक ऐसा मानवीय पक्ष दिखाई दिया,
जिसे दूर बैठकर समझना आसान नहीं है। यह कहानी केवल बंदूक छोड़ने की
नहीं, बल्कि एक सामान्य जिंदगी को दोबारा पाने की कोशिश की
भी है।
इसके बाद इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा के
पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की। उन्होंने क्षेत्र में सुरक्षा,
शांति, विकास और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने के
प्रयासों के बारे में जानकारी ली। इस दौरान उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि
बस्तर के दूरस्थ और कभी कठिन माने जाने वाले इलाकों तक सुरक्षा के साथ नागरिक
सुविधाओं और विकास की पहुंच किस तरह बढ़ रही है।
सुकमा में ही दल ने साइंस पार्क का
भ्रमण किया। जंगलों और संघर्ष की छवि से इतर यह पड़ाव बस्तर की उस तस्वीर से परिचित
कराने वाला था, जिसमें शिक्षा, विज्ञान और आधुनिक सुविधाओं के लिए भी जगह बन रही है। इसके बाद सफर
तोंगपाल की ओर बढ़ा। भोजन के बाद दल जगरगुंडा के लिए रवाना हुआ। इस यात्रा का सबसे
महत्वपूर्ण हिस्सा वह मार्ग था, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘खूनी सड़क’ के नाम से जाना जाता है।
इसी रास्ते से गुजरते हुए
इंफ्लुएंसर्स ने उस दौर की जानकारी ली, जब
यह क्षेत्र लंबे समय तक नक्सली हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र रहा।
जगरगुंडा पहुंचकर उन्हें उस क्षेत्र के बारे में बताया गया, जो
वर्ष 2010 में सुरक्षा बलों के 76 जवानों
की शहादत से जुड़े ताड़मेटला हमले की स्मृति से जुड़ा है। 6 अप्रैल
2010 को हुए इस हमले में 76 सीआरपीएफ
जवानों की जान गई थी।
यह पड़ाव इंफ्लुएंसर्स के लिए केवल
इतिहास जानने का अवसर नहीं था। जिन स्थानों के नाम कभी देशभर में हिंसा की खबरों
के साथ सुर्खियों में आते थे, वहां
खड़े होकर उस अतीत को समझना उनके लिए बस्तर को एक अलग नजरिए से देखने जैसा था।
लेकिन इसी सफर में उन्हें यह भी
महसूस हुआ कि बस्तर की कहानी केवल अतीत में अटकी हुई नहीं है। जगरगुंडा से आगे
बढ़ते हुए इंफ्लुएंसर्स केरलापेंदा पहुंचे। यहां उन्होंने ग्रामीणों से संवाद किया
और क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जाना। ग्रामीणों के अनुभवों ने उन्हें यह
समझने का अवसर दिया कि वर्षों तक संघर्ष से प्रभावित रहे इलाके में सामान्य जीवन
की वापसी का अर्थ स्थानीय लोगों के लिए क्या है।
केरलापेंदा में उनका सामना बस्तर की
इस बदलती तस्वीर के सबसे मार्मिक प्रतीकों में से एक श्रीराम मंदिर से हुआ। यह वही
मंदिर है, जो डर और भय से करीब 21
वर्षों तक बंद रहा था। मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। वर्ष 2003
में माओवादी प्रभाव के दौर में ग्रामीणों को मंदिर बंद रखने और वहां
पूजा-अर्चना न करने का फरमान दिया गया था। भय का ऐसा वातावरण था कि लोग मंदिर के
आसपास जाने से भी बचते थे। मंदिर में पूजा करीब 21 वर्षों तक
बंद रही।
फिर अप्रैल 2024 में परिस्थितियां बदलीं।
सुरक्षा बलों की मौजूदगी और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई की गई। करीब 21
वर्षों से बंद मंदिर के कपाट फिर खुले। ग्रामीणों और सीआरपीएफ
जवानों ने मिलकर मंदिर परिसर की सफाई की और भगवान श्रीराम, माता
सीता तथा भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना दोबारा शुरू हुई।
जिस मंदिर के दरवाजे कभी भय के कारण
बंद हुए थे, वहां फिर पूजा की घंटियां
सुनाई देने लगीं। बस्तर की बदलती तस्वीर को समझने के लिए शायद इससे अधिक भावनात्मक
दृश्य मुश्किल है, एक ओर बंदूक और भय का अतीत, दूसरी ओर फिर से जलता दीप और मंदिर में लौटती पूजा।
केरलापेंदा का यह प्रसंग इसलिए भी
महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गांव कभी माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में जाना
जाता था। वर्ष 2025 में यहां से 9 सहित कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद
केरलापेंदा को माओवादी मुक्त गांव घोषित किया गया था।
यही कारण है कि इंफ्लुएंसर्स के लिए
केरलापेंदा केवल यात्रा का एक पड़ाव नहीं रहा। यह उनके सामने बस्तर के बदलाव की एक
जीवंत मिसाल बनकर उभरा, जहां कभी भय के कारण
पूजा रुक गई थी, वहीं अब ग्रामीण जीवन और धार्मिक गतिविधियों
की वापसी दिखाई दे रही है।
इसके बाद
इंफ्लुएंसर्स का दल पूवर्ती की ओर रवाना हुआ। जंगलों और दूरस्थ
इलाकों से गुजरते हुए कई घंटे की यात्रा के बाद वे रात में पूवर्ती पहुंचे।
पूवर्ती नक्सली कमांडर हिडमा का पैतृक गांव है। यहां
इंफ्लुएंसर्स ने हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से संवाद
किया। उन्होंने परिवार से गांव की वर्तमान परिस्थितियों, स्थानीय
जीवन और क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जानकारी ली।
यह मुलाकात इस पूरे सफर का सबसे
संवेदनशील पड़ाव रही। एक ओर देश में जिस नाम की पहचान नक्सल हिंसा से जुड़ी रही,
वहीं दूसरी ओर उसी व्यक्ति के पैतृक गांव में उसके परिवार के
सदस्यों से आमने-सामने बैठकर बातचीत करना बस्तर की जटिल सामाजिक वास्तविकता को
समझने का अलग अनुभव था।
इंफ्लुएंसर्स ने इस मुलाकात को केवल
अतीत की घटनाओं तक सीमित नहीं रखा। उनकी रुचि इस बात को समझने में भी रही कि आज
गांव में लोग किस तरह रह रहे हैं, उनके
सामने क्या परिस्थितियां हैं और क्षेत्र में बदलाव को वे किस तरह देखते हैं।
पूवर्ती तक पहुंचने का यह सफर बस्तर
की एक ऐसी तस्वीर सामने लाता है, जिसमें
कई परतें एक साथ दिखाई देती हैं। सुकमा के पुनर्वास केंद्र में हथियार छोड़कर
मुख्यधारा की ओर लौटे लोग, पुलिस प्रशासन की सुरक्षा और
विकास संबंधी पहल, जगरगुंडा में 76 जवानों
की शहादत की स्मृतियां, केरलापेंदा में ग्रामीणों से संवाद,
21 साल बाद दोबारा खुला श्रीराम मंदिर और अंत में पूवर्ती में हिडमा
के परिवार से मुलाकात, इन सभी पड़ावों ने बस्तर के अतीत और
वर्तमान को एक ही यात्रा में सामने ला दिया।
दिल्ली से आए इंफ्लुएंसर्स के लिए यह
अनुभव इसलिए भी अलग रहा क्योंकि उन्होंने बस्तर को केवल पर्यटन स्थलों के जरिए
नहीं देखा। उन्होंने उन गांवों और इलाकों तक पहुंचकर लोगों से बातचीत की,
जिनकी पहचान लंबे समय तक राष्ट्रीय समाचारों में हिंसा की घटनाओं के
साथ होती रही।
इस यात्रा में बस्तर के दो चेहरे एक
साथ दिखाई दिए। एक चेहरा उस अतीत का था, जिसकी
स्मृतियां जगरगुंडा की सड़कों और शहादत से जुड़े स्थानों में आज भी मौजूद हैं। दूसरा
चेहरा उस वर्तमान का था, जिसमें पुनर्वास, सुरक्षा, ग्रामीण संवाद, धार्मिक
गतिविधियों और विकास के जरिए सामान्य जीवन को मजबूत करने की कोशिशें दिखाई दे रही
हैं।
और शायद बदलते बस्तर की सबसे मार्मिक
तस्वीर केरलापेंदा के उस मंदिर में दिखाई देती है, जहां
कभी भय के कारण पूजा रुक गई थी और वर्षों तक दरवाजे बंद रहे। फिर एक दिन वही
दरवाजे खुले, धूल साफ हुई, संगमरमर की
प्रतिमाओं के सामने दीप जला और पूजा की आवाज फिर सुनाई दी। यह केवल एक मंदिर के
खुलने की घटना नहीं, बल्कि उस क्षेत्र में सामान्य सामाजिक
और धार्मिक जीवन की वापसी की एक प्रतीकात्मक तस्वीर भी है।
बस्तर की कहानी इसलिए अब केवल यह
नहीं है कि वहां अतीत में क्या हुआ। कहानी यह भी है कि उस अतीत से निकलकर वहां आज
क्या बदल रहा है। जिन इलाकों की पहचान कभी भय और संघर्ष से होती थी,
वहां संवाद की शुरुआत हो रही है, ग्रामीणों और
सुरक्षा बलों के बीच संपर्क बढ़ रहा है, विकास की गतिविधियां
पहुंच रही हैं और लोगों के जीवन में सामान्यता लौटने के उदाहरण दिखाई दे रहे हैं।
सुकमा से जगरगुंडा,
केरलापेंदा से पूवर्ती तक 43 इंफ्लुएंसर्स का
यह सफर इसी बदलती तस्वीर का प्रत्यक्ष अनुभव रहा। रात करीब 11 बजे दंतेवाड़ा पहुंचने तक उनके पास बस्तर की कई तस्वीरें थीं। पुनर्वास
केंद्र में मिले वे चेहरे, जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ा,
शहादत की स्मृतियों से भरे रास्ते, ग्रामीणों
की बैरिन, 21 वर्षों बाद फिर खुले मंदिर में स्थापित श्रीराम,
माता सीता और लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं; और पूवर्ती में हुई संवेदनशील मुलाकात।
इन सभी तस्वीरों को जोड़ने पर जो
कहानी बनती है, वह बस्तर को केवल उसके
अतीत से नहीं, बल्कि उसके बदलते वर्तमान से देखने की कहानी
है। एक ऐसा वर्तमान, जिसमें संघर्ष की स्मृतियां अभी भी
मौजूद हैं, लेकिन उनके बीच शांति, संवाद,
विकास और नई उम्मीद की तस्वीर भी लगातार उभर रही है।