रायपुर : छत्तीसगढ़ के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने हरियाणा प्रवास के दौरान विश्व की प्राचीनतम नगरीय सभ्यताओं में शामिल सिंधु-घाटी (हड़प्पा) सभ्यता के प्रमुख पुरातात्विक स्थल राखीगढ़ी टीला का अवलोकन किया। उन्होंने इस ऐतिहासिक धरोहर का निरीक्षण करते हुए यहां प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों, प्राचीन नगर नियोजन, शिल्पकला, जल प्रबंधन प्रणाली तथा औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्यों की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने कहा कि राखीगढ़ी भारत की प्राचीन सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और सामाजिक प्रगति का अद्भुत प्रमाण है, जो विश्व के समक्ष भारतीय सभ्यता की समृद्ध विरासत को स्थापित करता है।
अवलोकन के दौरान
श्री अग्रवाल ने कहा कि राखीगढ़ी केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के गौरवशाली इतिहास का
जीवंत दस्तावेज है। यहां प्राप्त अवशेष यह प्रमाणित करते हैं कि हजारों वर्ष पूर्व
भी भारत में सुव्यवस्थित नगर नियोजन, विकसित शिल्प परंपरा,
व्यापारिक गतिविधियां और समृद्ध सांस्कृतिक जीवन विद्यमान था। ऐसे
स्थल हमारी सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करते हैं तथा इतिहास को केवल पुस्तकों तक
सीमित न रखकर उसे प्रत्यक्ष अनुभव का अवसर प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसी अमूल्य
पुरातात्विक धरोहरों का संरक्षण, संवर्धन
और उनके ऐतिहासिक महत्व को भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाना हम सभी का सामूहिक
दायित्व है। विरासत का संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज, शिक्षण संस्थानों, शोधकर्ताओं और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है।
श्री अग्रवाल ने कहा कि हरियाणा के
राखीगढ़ी जैसे पुरातात्विक स्थलों का संरक्षण पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है। इसी
प्रकार छत्तीसगढ़ भी हजारों वर्षों की सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक विरासत का धनी
प्रदेश है। यहां सिरपुर, बारसूर, भोरमदेव, मदकूद्वीप, ताला,
मल्हार, रतनपुर, राजिम
तथा दंतेवाड़ा जैसे अनेक ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल भारतीय संस्कृति, स्थापत्य कला और धार्मिक सहिष्णुता की अमूल्य धरोहर हैं। इन स्थलों में
प्राचीन मंदिर स्थापत्य, बौद्ध विहार, शैव,
वैष्णव एवं जैन परंपराओं के उत्कृष्ट प्रमाण आज भी सुरक्षित हैं,
जो प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करते हैं।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ शासन
पर्यटन एवं संस्कृति विभाग के माध्यम से प्रदेश की पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण,
संवर्धन, शोध, अभिलेखीकरण
और पर्यटन विकास के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। हमारा प्रयास है कि ऐतिहासिक
स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ते हुए उनकी मूल ऐतिहासिक गरिमा को अक्षुण्ण रखा
जाए, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का
समग्र अनुभव प्राप्त हो सके।
श्री अग्रवाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ की
पहचान केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि
यहां की पुरातात्विक और सांस्कृतिक धरोहरें भी हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं।
इन धरोहरों का वैज्ञानिक संरक्षण, प्रभावी
प्रचार-प्रसार और जनसहभागिता के साथ विकास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशभर में भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को
संरक्षित करने और उसे वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में व्यापक कार्य किए जा रहे
हैं। छत्तीसगढ़ भी इसी भावना के अनुरूप अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण,
सांस्कृतिक गौरव के संवर्धन तथा विरासत पर्यटन के विकास के लिए
निरंतर प्रतिबद्ध है।
श्री अग्रवाल ने आगे कहा कि इतिहास
और विरासत किसी भी समाज की पहचान और उसकी आत्मा होते हैं। इसलिए हमारी जिम्मेदारी
है कि हम अपनी पुरातात्विक धरोहरों को सुरक्षित रखें,
उनके महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाएं तथा उन्हें सांस्कृतिक चेतना,
शोध और पर्यटन विकास का सशक्त माध्यम बनाएं। इससे न केवल हमारी
सांस्कृतिक विरासत संरक्षित होगी, बल्कि स्थानीय
अर्थव्यवस्था, रोजगार और पर्यटन को भी नई गति मिलेगी।