रायपुर : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की दूरदर्शी पहल मोर गांव मोर पानी अभियान आज गांवों में जल आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है। इसी अभियान के अंतर्गत एमसीबी जिले के मनेन्द्रगढ़ जनपद पंचायत क्षेत्र के ग्राम मुख्तियारपारा में वर्षों से उपेक्षित एक अनुपयोगी स्टापडेम को नया जीवन मिला है। बहते पानी को सहेजने की इस सामूहिक कोशिश ने न सिर्फ जल संकट दूर किया बल्कि खेती, पशुपालन और ग्रामीण जीवन को नई दिशा दे दी।
जब जर्जर स्टापडेम बना
समस्या
ग्राम मुख्तियार पारा में कई वर्ष
पूर्व एक स्थानीय नाले पर निर्मित स्टापडेम समय के साथ जर्जर हो चुका था। गाद जमाव
के कारण इसकी जल धारण क्षमता लगभग समाप्त हो गई थी। सर्दियों के बाद नाले का
प्रवाह कम होते ही ग्रामीणों को दैनिक उपयोग तक के लिए पानी नहीं मिल पाता था।
खेतों की सिंचाई तो दूर, पशुओं के लिए भी जल
का संकट बना रहता था।
ग्राम
सभा से निकली समाधान की राह
गत वित्तीय वर्ष में आयोजित ग्राम
सभा में मोर गांव मोर पानी अभियान पर चर्चा हुई। ग्रामीणों ने एकजुट होकर खराब पड़े
स्टापडेम के पुनरुद्धार का प्रस्ताव रखा। सामुदायिक जलभराव क्षेत्र निर्माण एवं
भूमि सुधार कार्य को सर्वसम्मति से स्वीकृति मिली। महात्मा गांधी नरेगा के अंतर्गत
लगभग 4.95 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति
प्रदान की गई और ग्राम पंचायत मुख्तियार पारा को निर्माण एजेंसी बनाया गया। तकनीकी
निगरानी में यह कार्य समय-सीमा के भीतर सफलतापूर्वक पूर्ण हुआ।
जल
से समृद्ध हुआ गांव का भविष्य
सिल्ट हटने और भूमि सुधार कार्य के
बाद स्टापडेम में जल का ठहराव पहले की तुलना में कहीं अधिक हो गया है। इसका सीधा
लाभ ग्राम सलका और सिरौली के लगभग 45 परिवारों
को मिल रहा है। आज यहां घरेलू उपयोग, पशुपालन और निस्तार के
लिए भरपूर जल उपलब्ध है। आसपास के जलस्तर में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इस
जलसंचय के कारण 8 से 10 परिवारों ने
रबी फसल के साथ-साथ सब्जी उत्पादन भी शुरू कर दिया है और पांच एकड़ से अधिक कृषि
भूमि सिंचित हो चुकी है।
यह कहानी बताती है कि जब सरकार की योजना,
ग्राम सभा की सहभागिता और श्रमशक्ति एक साथ आती है, तो अनुपयोगी संरचनाएं भी समृद्धि का आधार बन जाती हैं। मोर गांव मोर पानी
अभियान के तहत किया गया यह कार्य ग्रामीण आत्मनिर्भरता, जल
संरक्षण और टिकाऊ विकास की एक प्रेरणादायी सफलता की कहानी बनकर उभरा है।